जैव-विविधता मानव कल्याण के साथ बहुत ही गहराई के साथ जुड़ा हुआ है । यह इसलिए कि इसका प्रभाव पारिस्थितिक तंत्र, सेवाओं, कार्यों तथा वातावरण नियंत्रण पर पड़ता है । इस कारण से जैव विविधता को संरक्षित करना आवश्यक हो जाता है। भारत में विश्व के अत्याधिक जैव विविधता वाले क्षेत्र स्थित है जहाँ पर अनेक स्थानिक तथा लुप्तप्राय प्रजातियां, जैसे – एशियायी शेर, नीलगिरी थार, सिंह, पूंछ वाला मैकाक, जेर्डन कर्सर, केन कछुआ तथा बैंगनी रंग का मेंढक बसी हुई हैं । हाल ही के दिनों में इनकी संख्या में मानव द्वारा उत्पन्न हालातों की वजह से काफी गिरावट आयी है । कुछ प्रजातियाँ तो पूर्ण रूप से लुप्त हो गयी है –जिनमें प्रमुख हैं, भारतीय चीता तथा गुलाबी सिर वाली बतख आदि । कृषि प्रदेशों के विकास, शहरीकरण, सड़क व बांध निर्माण के कारण वनों के विखण्डन, प्रदूषण, रोगों का फैलाव, अंत:प्रजनन दबाव तथा शिकार आदि कुछ ऐसे कारण हैं, जिनके कारण इनकी संख्या और निवास स्थानों में कमी हुई है । ऐसे कारणों का जिनसे इस तरह का ह्रास हो रहा है, उनकी पहचान करने तथा उनको रोकने के उपायों के बारे में वैज्ञानिक अध्ययन करने की आवश्यकता है ।

जैव प्रौद्योगिकी का ऐसे तकनीक तथा अनुप्रयोगों के साथ संबंध है जो जीवित प्राणियों में परिवर्तन या उन्नति लाता है ताकि हमारे लिए अपेक्षित उत्पाद दे सके । जिस प्रकार के तकनीक तथा अनुप्रयोग आज जैव प्रौद्योगिकी में प्रयोग में लाए जाते हैं, उन्हें संरक्षण प्रयोजन के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है । अत्याधिक प्रजातियां, जो लुप्त होने के कगार पर हैं – उनकी इस हालत के कारण उनके आवासीय प्रदेशों और आनुवंशिक भिन्नता में कमी हैं । इस प्रकार के हालात विश्व के गरीबी तथा संघर्ष पूर्ण क्षेत्रों तथा वैश्विक जैवविविध के लिए चिंताजनक बने क्षेत्रों में देखे जाते हैं ।
इस तरह की प्रजातियों के लिए इन-विट्रो उपायों को सहजता के साथ प्रभावी रूप से उपयोग में लाया जा सकता है । इससे इनकी विलुप्तता के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है । इन तकनीकों को विविध उपयोग में लाए जाने वाले उपकरण भी सभी के लिए आसानी से उपलब्ध हैं । इस तरह संरक्षण बढ़ाने के लिए प्रयोग करने के उद्देश्य से विकसित तथा उपयोगिता उपकरणों तथा तकनीकों को ‘संरक्षण जैव प्रौद्योगिकी के रूप में जाना गया है ।‘ विज्ञान के इस उभरते क्षेत्र को पहले ही काफी सफलता मिल चुकी है । इस विज्ञान ने लुप्तप्राय जानवरों और उनके युग्मकों के भण्डारण तथा वन्यप्रणियों को पुन:सृजित करने के बारे में काफी बारीकी जानकारी उपलब्ध की है । इन्हीं उपकरणों को जानवरों के व्यवहार जानने प्रजातियों के क्रमिक विकास का पता करने में संरक्षण स्थिति को मजबूत करने, आपराधिक मामलों को सुलझाने तथा वन्यप्राणियों के रोगों को उनके आरंभिक स्तर पर ही पहचान करने में भी सफलतापूर्वक उपयोग में लाया जा सकता है ।