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सीसीएमबी को आधुनिक जीवविज्ञान के अंतर्गत अग्रगामी एवं बहुआयामी क्षेत्रों में आधारभूत अनुसंधान करने एवं उनके संभावित अनुप्रयोगों की खोज की  जिम्मेदारी सौंपी गई है । सीसीएमबी में जारी शोधकार्य को निम्नलिखित प्रमुख विषयों में बांटा जा सकता है ।

कोशिका जैविकी एवं उपकोशिकीय सम्मिश्र : इस कार्यक्रम के अंतर्गत : सामान्य एवं बीमारी की अवस्थाओं में कोशिका के प्रकार्य; साइटोस्केलेटन रिआर्गेनाईजेशन एवं कोशिका प्रकार्यों का विनियमन; लैमिनोपैथीज का आणविक संगठन एवं आणविक आधार; कोशिका जैविकी का संकेतन, मस्तिष्क के विकारों में उपापचय एवं जीन विनियमन, जीवाणुओं में शीत अनुकूलता एवं क्रोमेटिन संगठन और विनियमन में आणविक संरचना की बनावट, संघटन तथा प्रकार्य ।

प्रोटीन एवं वृहदाण्विक असेम्बली : इस क्षेत्र की प्रमुख गतिविधियों के अंतर्गत : इसके विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए प्रोटीन वलन, त्रुटिपूर्ण वलन के कारण होने वाले परिणाम, शेपरॉन प्रकार्य एवं आयन वलन को नियंत्रित करने की प्रक्रिया, ट्रांसलेशनल प्रूफरीडिंग, एक प्रक्रिया- जिसके द्वारा गलत अमीनो अम्ल, tRNA से हटा दिये जाते हैं, जैव रासायनिक, संरचनात्मक एवं इन-विवो विधियों का इस्तेमाल करते हुए और रिसेप्टर्स पर विशेष ध्यान देते हुए प्रोटीनों की झिल्ली के प्रकार्यात्मक क्रियावेधिक आधार को समझना । अन्य शोध क्रियाकलाप के अंतर्गत पेप्टाइड झिल्ली की अंतक्रियाओं का अध्ययन करना भी शामिल है जिससे कोशिकाओं में प्रोटीन के पृथक्करण, झिल्ली-सक्रिय पेप्टाइड टॉक्सिनों के कार्य की क्रियाविधि जैसी जैविक प्रक्रियाओं को समझना, RNAi मशीनरी का संरचनात्मक अध्ययन एवं कैल्शियम बंधनकारी प्रोटीनें इत्यादि के बारे में अध्ययन ।

आनुवंशिक परीक्षण एवं जीनोमिक्स : इस क्षेत्र में चल रही शोध के उद्देश्यों के अंतर्गत जीनोम के संदर्भ में जीवविज्ञान का अध्ययन करना तथा एपीजेनेटिक विनियमन की क्रियाविधि को उजागर करने के लिए इस जानकारी को इस्तेमाल में लाना शामिल है । इस क्षेत्र की प्रमुख गतिविधियों के उद्देश्यों में- कैसे जीन अभिव्यक्ति से उत्पन्न विनियमन से जीनोम आवरित रहता है, इस बात को समझना; विभेदन में एपीजेनेटिक क्रियाविधि की क्या भूमिका होती है, वृद्धि एवं पुनरूत्पादन, भारतीय जनसमूहों में बीमारियों में होने वाले  कौन से अनुक्रमण परिवर्तन होते है; और जटिल बीमारियों तथा चिकित्सकीय फीनोटइप में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की भूमिका को समझना शामिल है ।

पादप विकास की जैविकी एवं रोग : पौधों में जैविक एवं अजैविक दबावों से जूझने की विशिष्ट विकासात्मक प्रणालियां एवं कार्य-योजनाएं होती हैं । इसके अंतर्गत वर्तमान में जारी गतिविधियों में : पादप प्रजननात्मक विकास, पादप गुणसूत्र संगठन एवं अर्धसूत्रीविभाजन का नियंत्रण, दबावों के प्रति पौधों में अनुकूलता, पादप रोग प्रतिरोधता, फसलों में आणविक मार्करों एवं मैप का विकास शामिल है ।

संक्रमण एवं बीमारी का आणविक आधार : लिश्मेनिया प्लाज्मोडियम Mtb एचसीवी एवं एचआईवी जैसे संक्रामक रोगाणु, भारत में होने वाले रूग्णता एवं मौतों के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार माने जाते हैं । इन रोगाणुओं की जैविकी एवं उद्विकास तथा परपोषी के साथ उनकी अंत:क्रिया का पता लगाया जा रहा है ।

उद्विकासात्मक जैविकी एवं वन्यजीव संरक्षण : आण्विक मार्करों का इस्तेमाल करने द्वारा  प्रजातियों के इंटर एवं इंट्रा-स्पेसिफिक आनुवंशिक पूर्ति का पता लगाने के लिए और  सहायक प्रजननात्मक तकनीकों को सीसीएमबी में विकसित किया जा रहा है । सीसीएमबी में जारी आणविक उद्विकासात्मक अध्ययनों से वन्य प्रजातियों में फाइलोजेनेटिक संबंधों की पूर्ण जानकारी मिल सकेगी और इससे वन्य तथा लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने व उनको संरक्षित करने हेतु कार्यनीतियां तैयार करने तथा पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी ।
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